धुरंधर फिल्म विवाद: धुरंधर फिल्म को लेकर मचे बवाल की असली सच्चाई क्या है? कुछ लोग इसे Anti-Muslim क्यों कह रहे हैं और उनके तर्कों में कितना दम है? पढ़ें पूरा विश्लेषण।

धुरंधर रिलीज़ होते ही क्यों मच गया बवाल?

धुरंधर की रिलीज़ के बाद से एक खास वर्ग इस फिल्म का इतना विरोध कर रहा है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी जी को उन्हें संदेश देकर शांत कराना पड़ा। सबसे हैरानी की बात यह है कि जो फिल्म पाकिस्तान में लोगों को रुला रही है और दुखी कर रही है, उसी फिल्म को देखकर हमारे देश में भी कुछ लोग दुखी हो रहे हैं। आखिर क्यों?

इस लेख में हम उन्हीं लोगों के तर्कों की परख करेंगे जो इस फिल्म को नापसंद कर रहे हैं।

क्या धुरंधर सच में Anti-Muslim फिल्म है?

फिल्म के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यही है कि यह “Anti-Muslim” है। लेकिन यह तर्क कहाँ तक सही है?

सच्चाई यह है:

  • फिल्म की पूरी कहानी पाकिस्तान में घटित होती है।
  • फिल्म में भारत का एक भी मुस्लिम किरदार नहीं है।
  • फिल्म में येलीना का किरदार पूरी तरह आधुनिक तरीके से जीती है।
  • रहमान डकैत की पत्नी के साथ सम्मानजनक व्यवहार दिखाया गया है। यहाँ तक कि वो सबके सामने रहमान को थप्पड़ मारती है और वो कुछ नहीं कहता।
  • फिल्म में किसी भी पाकिस्तानी महिला को बुर्के में कैद या अत्याचार का शिकार नहीं दिखाया गया।

फिल्म सिर्फ Major इकबाल और ISI के नेटवर्क को निशाना बनाती है। तो फिर यह Anti-Muslim कैसे हो गई? सच तो यह है कि यह फिल्म Anti-Muslim नहीं, बल्कि Anti-Terrorism है।

Factually Incorrect का रोना — कितना सही?

फिल्म के विरोधियों का दूसरा तर्क है कि यह फिल्म “तथ्यात्मक रूप से गलत” है।

उनका दावा: जहूर मिस्त्री का “भारत माता की जय” वाला संवाद कंदहार हाईजैक के समय नहीं हुआ था।

सच्चाई: फिल्म ने खुद को “Inspired by True Events” बताया था। यानी, तथ्यों के साथ कुछ काल्पनिक तत्व भी जोड़े गए हैं। लेकिन जो भी तथ्य हैं, वे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और स्क्रीन पर टेक्स्ट के साथ दिखाए गए हैं।

इसके अलावा ये सारे तथ्य भी सच हैं:

  • अब्दुल रहमान मक्की समेत दर्जन भर ISI अधिकारियों का सफाया — यह पिछले पाँच वर्षों में हुआ।
  • जावेद करानी और उसका भाई वाकई नकली नोटों का धंधा करते थे।
  • नेपाल के रास्ते से भारत में जाली नोट और हथियारों की तस्करी — यह एक स्थापित तथ्य है।
  • कंदहार हाईजैक, संसद हमला, 26/11 — ये सब हकीकत हैं।
  • कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और पंजाब में ड्रग्स तस्करी — इनसे कोई इनकार नहीं कर सकता।

तो फिल्म कहाँ से गलत हो गई?

Propaganda का आरोप — पर Hypocrisy किसकी?

कुछ लोगों को फिल्म में अतीक अहमद का संदर्भ बुरा लग गया। उनका कहना है कि उसे इस तरह दिखाना गलत है।

यहाँ एक ज़रूरी बात याद दिलाना ज़रूरी है। इस देश में पहले भी राजनेताओं की Parody और आलोचना फिल्मों में होती रही है। गुजरात दंगों को बार-बार highlight किया गया — तब किसी ने इतना हंगामा नहीं किया।

दीपा मेहता की फिल्म “Fire” याद है? इस्मत चुगताई की किताब “लिहाफ” पर बनी इस फिल्म में दोनों किरदारों के नाम बदलकर राधा और सीता रख दिए गए — जबकि मूल किताब में नाम बेगम जान और रब्बू थे। उस समय यही लोग “Freedom of Expression” की दुहाई दे रहे थे।

आज वही लोग धुरंधर में किरदार के नाम को लेकर रो रहे हैं। Hypocrisy की भी एक सीमा होती है।

नफरत दिखाने पर आपत्ति — पर असली नफरत किसकी?

कुछ आलोचकों का कहना है कि फिल्म में “नफरत बहुत दिखाई गई है।”

लेकिन एक सवाल — क्या पाकिस्तान आज भी Global Terrorism का केंद्र नहीं है? क्या क्रिकेट मैदान में पाकिस्तानी खिलाड़ी का भारतीय विमान गिराने की एक्टिंग करना नफरत नहीं है?

1947 से लेकर आज तक उन्होंने हमारे प्रति नफरत रखी है। अगर फिल्म में उसी नफरत का एक हिस्सा दिखाया गया तो इसमें समस्या क्या है?

Dhurandhar Movie vivaad: निष्कर्ष

धुरंधर को नापसंद करने वालों की संख्या बहुत कम है, लेकिन उनका शोर बहुत ज़्यादा है। उनके तर्कों में न तर्क है, न तथ्य — बस एक agenda है।

आपसे एक सवाल:

  • धुरंधर में आपको कौन सी चीज़ सबसे अच्छी लगी?
  • या कोई ऐसी बात जो आपको बिल्कुल पसंद नहीं आई?

Comment करके ज़रूर बताएं।

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Mera naam Prem hai aur main ek dedicated Blogger hoon, jise Movie News aur Reviews ki field mein 5 Years (5 saal) se zyada ka anubhav hai. Pichle panch saalon mein maine cinema ki har bariki ko samjha hai aur apne blog ke madhyam se audience tak hamesha sateek aur unbiased (nishpaksh) information pahunchayi hai. Bollywood se lekar Hollywood tak, main movies ka gahra analysis karta hoon taaki aapko mil sake behtareen movie suggestions.

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